साथियों ,
हमारा मंच की स्थापना के तीन वर्ष हो चुके हैं। हमारा मंच की प्रति सप्ताह होने वाली बैठक में तमाम जन आंदोलनों तथा सामाजिक घटनाओ पर लगातार चर्चा की जाती है। संसथान में कार्य कर रहे कामगार साथी चांहे वे किसी भी कार्य से जुड़े साथी । आप सभी को मालूम है की आज के समय में हमारी समस्याओं को सुनने या संसथान के सामने उठाने वाला कोई भी संगठन नहीं है।
हमारा मंच से जुड़े साथियों ने समय समय पर कई समस्याओं को साझा कर उनका हल भी निकाला है , तथा पुनः उन साथियों को उनका अधिकार मिला है। वैसे तो संसथान का नाम देश विदेश एवं हर तरफ रोशन हो रहा है ,लोगों में यह धारणा बनी है कि इस संसथान में हर तरफ अच्छा एवं स्वस्थ्य माहोल है । हर वर्ग के लोग संसथान की उन्नति में अपना योगदान दे रहे हैं। परन्तु यदि देखा जाये तो सुख सुविधाओं के लिए संसथान में लोगों को दो भागों में बाँट दिया गया है।
१.) फैकेल्टी व कर्मचारी जिनके लिए सुख सुविधाओं का अम्बार लगा है तथा जिन्हें एक मजदूर के एक माह में मिलने वाले वेतन के बराबर उनका दैनिक वेतन होता है।
२.) दूसरा वर्ग ठेका मजदूर जिनको सरकार द्वारा निर्धारित मजदूरी भी नहीं मिलती , जबान खोलने पर नौकरी से निकाल दिया जाता है। किसी से बात न कर सकें इसलिए परिसर में घुसने पर पाबन्दी लगा दी जाती है। उसे किसी अपराधी की तरह देखा जाता है, अपने अधिकारों की बात तो दूर मौलिक अधिकारों को भी छीना जा रहा है। जैसे - हम एक साथ बैठ कर बात नहीं कर सकते , खाना नहीं खा सकते , हम काम के दौरान थक जाने पर बैठ नहीं सकते , शौचालय नहीं जा सकते यह सब करने पर अधिकारीयों द्वारा फोटो खिचवाया जाता है, अगले दिन कामगार साथी को निकाल
दिया जाता है या फिर बैठकी दे दी जाती है संसथान के हिसाब से हमें आठ या उससे अधिक घंटे कार्य करना चाहिए जो कामगार साथी का सीधे शोषण है। पर साथियों जब तक हमारा जीवन है कमाकर खाना हमारी जरूरत है। इसके लिए लगातार संघर्षरत रहना जरूरी है व हमें हमारे अधिकारों को जानना भी बहुत जरूरी है । जिन अधिकारों को पाने के लिए हमें कोई नहीं रोक सकता । साथियों हम अपने अधिकारों को पहिचाने इसके लिए ......
१) एक दूसरे को जानना - साथियों यदि देखा जाये तो संसथान में कामगार साथियों की संख्या ४००० हजार से ज्यादा है जो गिनती में सबसे ज्यादा हैं पर ताकत में कमजोर होने के कारण लगातार भयभीत किया जा रहा है । बातचीत करना दूर हम एक दूसरे को देख भी नहीं सकते क्यूंकि निकाले जाने का डर बना रहता है। जबकि आपस में बातचीत करना हमारा कानूनन अधिकार है इसलिए भय को भगाना है व आपस में संपर्क रखना जरूरी है। इसके लिए आप संसथान के बाहर भी मिल सकते हैं।
२) एक दूसरे के काम आना आपस में संपर्क - संसथान में ए दिन हादसे होते रहते हैं , पर कामगार साथियों को पता ही नहीं चल पाता की आज हमारे साथी के साथ क्या हादसा हुआ है क्यूंकि ठेकेदार और अधिकारीयों द्वारा हमको भ्रमित रखा जाता है और हम उनकी बातों में आ जाते हैं जबकि ऐसी घटनाओं की जानकारी होते ही एक दूसरे को तुरंत बताना चाहिए जिससे इन घटनाओं पर अंकुश लग सके तथा एक साथ मिलकर पीड़ित परिवार के साथ खड़े हो सकें , यह पहल हमें एक दूसरे से जोड़ती है।
३) संगठित होना - जहाँ भी कार्य कर रहे हैं वहां अपने समूह में आपस में बातचीत के द्वारा समस्याओं को साझा करें फिर दूसरे समूहों से परिसर के बाहर या अपने गाँव में एक स्थान पर बैठकर बातचीत करें , जिस दिन ऐसा होगा हम संगठित होने में सफल होंगे।
४) संगठन की आवश्यकता - संगठन तो एक सहारा होता है असल में संगठन के पीछे साथियों की संगठित ताकत होती है जो अपनी मांगों को मनवा सकती है। संगठित होने की वजह से कई जगह कामगार साथी वापस काम पर रखे गए। पर्यावरण बिल्डिंग में कार्य करने वाले साथियों ने अपनी संगठित ताकत के बल पर ठेकेदार द्वारा काटा गया पैसा वापस लिया और इसी ताकत के बल पर लेबर कोर्ट में संसथान के ऊपर लगाये गए मुक़दमे भी लड़ रहे हैं। वी.एच व हाल-७ तथा ८ के साथियों ने संगठित ताकत के बल पर अपने काम को वापस लिया । यह पर्चा बताना चाहता है हम सभी संगठित होकर जिस दिन एक ताकत बन जायेंगे उस दिन लम्बी लड़ाई जीत सकते हैं। इसके लिए संगठित होकर एक संगठन बनाने की जरूरत है --आपके सुझाव का स्वागत है।
मजदूर हैं, मजबूर नहीं, शिक्षित होंगे , संगठित होंगे , संघर्ष करेंगे ।