शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

११/११/११/ A , B , C (C ) फॉर कांग्रेस मीन corruption १४ में ख़त्म होगा।

A - आदर्श ,अविनाशी ,आज्ञाकारी  बनाना  ( बाबा रामदेव) , B - भ्रष्टाचार ख़त्म करना ,भाई चारा लाना ( अन्ना हजारे) , C - कंप्लीट ,पूर्ण (श्री श्री रवि शंकर)
आज ११+११ +११ =३३  A + B + C = ABC (पूर्ण )  (C )  भ्रस्टाचार पर पूर्ण प्रहारहै।
 दिग्विजय सिंह को समझना चाहिए और विवेक से काम लेना चाहिए , संयम बरतना चाहिए डर के मारे अंट संट नहीं बकना चहिये । बीजेपी या RSS  कोई आतंकवादी संगठन नहीं हैं इसलिए ज्यादा आग बबूला होने की जरूरत नहीं है । आतंकवादी तो मुर्गा खा राये हैं , ये शाकाहारी हैं, देशप्रेमी है , देश की बात करते हैं । मेरी समझ  से दिग्विजय तथा स्वामी अग्निवेश जैसे लोग मीडिया में छाए रहना चाहते है , स्वामी होकर भी बिग्बोस के घर जाकर रहना व विदेशी माहौल में रहना यह भी हथकंडा है । ये आधुनिक जयचंद हैं जो भारत भूमि पर पृथ्वी राज चौहान को देखना नहीं चाहते ।
आत्माएं कभी मरती नहीं हैं दुबारा जन्म लेती हैं बदले हुए समय के  पृथ्वी राज व जयचंद के रूप में ।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

केंद्रीय कर्मियों का डीए 7% बढ़ा-पेट्रोल के दाम तीन रुपये बढ़े

कैबिनेट के इस फैसले से 50 लाख केंद्रीय कर्मचारियोंको लाभ होगा।महंगाई पर लगाम लगाने में नाकाम हो रही सरकार को उम्मीद है कि महंगाई  भत्ता कर्मचारियों को बढ़ती कीमतों से राहत दिलाने में कुछ मददगार साबित  होगा।
मगर भारत की ८० फीसदी जनता के बारे में कौन सोंचेगा । पेट्रोल के साथ साथ सभी चीजों के दाम बाद जायेंगे इससे बांकी लोगों को राहत कैसे मिलेगी ।
कांग्रेस क्या एक दो करोड़ लोगों  के बारे में ही  सोंचती है, जिन्हें ये अपना कर्मचारी कहती है इनके पेट में जो भोजन जाता है उसमे किसान -मजदूर का पसीना मिला होता है ।
बार बार  DA बढाने व टैक्स लेने से अच्छा होगा यदि यही पेट्रोल में सब्जिडी बड़ा देते तब सबका भला होता । मगर जनता को बेवकूफ समझा जाता है चुनाव आते आते कोई नया सिगूफा छोड़ देगें , लुहावने सपने दिखा देंगे फिर सत्ता में आ जायेंगे , मगर अब ऐसा नहीं होगा ।
मुझे लगता है ओमपुरी साहब सही बोल रहे थे , इस सरकार में जो मंत्री है शायद उनके पास दिमाग नहीं है खोखले लोग बैठे हैं। ये सरकार चलाना भी नहीं जानते , अपने आप को जरूरत से ज्यादा माननीय भी समझते हैं ।
हर मोर्चे पर फेल हैं शिक्षा , रक्षा , विदेश ,व्येपार , प्रसाशन ..... अरे हटो यार कुर्सी छोड़ो ... यदि सरकार प्राइवेट होती तो ऐसे मैनेजरों को नौकरी से निकाल देते, एक मिनट भी बर्दास्त नहीं करते ।
व्यापार व सीमाओं पर चाइना का कब्ज़ा धीरे धीरे बढता जा रहा है और ये कहते हैं ऐसा कुछ नहीं है । ये कांग्रेस सरकार चाहती है की एक सुई भी यही चाहिए तो चाइना से मंगा लो , बे वजह किसी चीज की फैक्ट्री खोलने से क्या फायदा जब बना बनाया मिल रहा हो , कच्चा माल हमसे लो और पका पकाया लो ।
ज्यादा कुछ लिखने से फायदा भी क्या जनता सब जानती है पिछले दिनों जो भी घटनाएँ घटी उससे पता चलता है पर सरकार (कांग्रेस) सोंचती है हमारे सिवा कोई विकल्प नहीं है  इसलिए जनता की मजबूरी का पीड़ा उठाया जाये , दूसरी तरफ शिक्षा को इतना महगा कर दिया जाये जिससे जमीन के लोग ऊपर न उठ संके , पढ़  लिख  न संके  एक उंच-नीच , अमीर -गरीब व साम्प्रदायिकता की खाई बनी रहे और आगे भी पचास साल तक राज करते रहें ।

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

संसद में सांसदों का आचरण और दूसरों से अपेक्षा ।.........................

घेरे में किरण बेदी, ओम पुरी
सांसदों ने दोनों सदनों में दिए विशेषाधिकार हनन के नोटिस
टीम अन्ना की सदस्य किरण बेदी और बॉलीवुड अभिनेता ओमपुरी को रामलीला मैदान में गांधीवादी अन्ना हजारे के समर्थन में नेताओं के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना भारी पड़ गया है। अभद्र टिप्पणियों से नाराज सांसदों ने दोनों के खिलाफ सोमवार को संसद में विशेषाधिकार हनन के नोटिस दिए हैं। अब इनसे जवाब तलब किया जाएगा।
क्या कभी संसद की मर्यादा भंग करने व अमर्यादित टिप्पड़ी , मेज-कुर्सी-माइक फेकने पर कभी जनता को सांसदों के खिलाफ जनता द्वारा चुनी गई संसद का अपमान करने पर विशेषाधिकार हनन का मुद्दा उठाया गया । अब इतनी मिर्ची क्यूँ लग रही है , जब किसी कक्षा में पीछे की कुर्सियों पर बैठे हुए विद्यार्थी कोई उत्तर नहीं दे पाते हैं, चल रही पढाई के दौरान मतलब नहीं रखते है । तब ऐसे विद्यार्थियों को भोंधू ,बुद्धू, गवांर न जाने क्या क्या कहा जाता है ऐसे शिष्य को कक्षा से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है । वैसे देश लोगों को पता है चुनाव के दौरान क्या क्या होता है ।
राइट टु रिकॉल’ पर अलग-अलग राय
कांग्रेस ने मुद्दे को अव्यवहारिक बताया, भाजपा इसके पक्ष में माकपा बोली, हम पहले से करते आ रहे हैं इस बारे में मांग
ऐसे कानून बनाने पर थोड़ी परेशानी जरूर होगी पर कुछ सालों में सब कुछ पटरी पर आ जायेगा जब अच्छे , इमानदार , पढ़े लिखे लोग चुन कर संसद व विधान सभा में आएंगे जबकि राज्य सभा व विधान परिषद् में पहले ही दिमाग दार लोग बैठे हैं । जो जनता द्वारा नहीं चुने जाते ।
अब अन्ना का अशर दिखने लगा है , लोगो में जाग्रति आई है अपने हक़ और मनवाने के अहिंसक तरीके जान गए हैं ,अब तस्वीर बदलने वाली है ।

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में इसलिए आना चाहिए।

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जिसमे जनता के द्वारा चुने हुए सभी  प्रतिनिधि आते हैं और उसी सदस्यों में से प्रधानमंत्री चुना जाता है ।( प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अपवाद हैं ) इसलिए प्रधानमंत्री को लोकपाल के दाएरे में आना चाहिए ।
दूसरा कारण यदि प्रधानमंत्री अपने पास किसी भी विषय के कितने भी मंत्रालय अपने आधीन रखते हैं या किसी भी मंत्रालय के मुखिया है तो प्रधानमत्री को लोकपाल के दाएरे में जरूर आना चाहिए ।
यदि प्रधानमंत्री सिर्फ प्रधानमंत्री के पद पर रहते है उनके पास कोई अतिरिक्त मंत्रालय नहीं है तो उन्हें इस दाएरे में कतई न लाया जाये । यदि प्रधानमंत्री अपने अधीन किसी भी मंत्रालय को रखते है तब यदि उस मंत्रालय में कोई  अनियमितता पाई जाती है तो उसकी जाँच कैसे होगी और उसका जवाबदेह कौन होगा  ।
अन्ना हजारे अब अन्ना हजारों हैं।
कानून की बारीकियां अब जान  गए हजारों हैं ।।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

अन्ना हजारे दूसरे गाँधी - हम सब आपके साथ हैं भ्रस्टाचार के खिलाफ हैं।

अन्ना हजारे और उनकी टीम की नहीं अब यह मुहिम पूरे देश की सरकारी व गैर सरकारी भ्रस्टाचार को जड़ से उखाड़ फेकने की मुहिम बन चुकी है । अब इसमें  किसी भी प्रकार का ब्रेक नहीं लगने दिया जाये । ऐसा भारत बनाने का सपना जिसमे राशन , बजली , पानी , नौकरी , किसी भी प्रकार का प्रमाण पत्र बनवाने में  रिश्वत देने व लेने पर शक्ति से रोंक लगे  तथा सरकारी कर्मचारी जिन्हें जिस काम की तनखाह मिलती उन रिश्वतखोरों को बेदखल करना , मजदूरों व  किसानो की पूरी पगार व हक़ मिले व भ्रष्ट ठेकेदार का लाइसेंस जप्त किया जाये । सिफारिश व रिश्वत के बल पर नाकाबिल  नौकरी पाए लोगों को बर्खास्त किया जाये व काबिल लोगों को आर्थिक , पारिवारिक व योग्यता के आधार पर वरीयता दी जाये, ऐसा भारत हो ।
जनता को प्रतिनिधि चुनने व नाकाबिल होने पर उसे हटाने का अधिकार भी  होना चाहिए वर्ना पांच साल तक झेलते रहो ऐसा नहीं होना चाहिए । देश की संसद व  विधायिका जनता की है , जनता के पैसे से चलती हैं , जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनधि होते हैं , जनता का अधिकार है किसी भी कानून को बनाने व अहितकर होने पर उसे बदलने का,  संसद  किसी मंत्री या प्रतिनिधि की बपौती नहीं है न ही अधिकार ये "जनता की अदालत" है। ऐसा भारत हो ।
माननीय अन्ना हजारे , बाबा रामदेव , किरण बेदी , अरविन्द केजरीवाल व अन्य ऐसे लोग यदि भ्रस्टाचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे तो कौन उठाएगा कोई तो शुरुआत करेगा , कोई  तो जनता को जगायेगा नहीं तो सोती जनता लुटती रहेगी इन भ्रष्ट राजनेता , अधिकारी , कर्मचारी , दलालों तथा कालाबाजारियों से ।
जागो और जगाओ ,सोतों को उठाओ।
भ्रस्टाचार को मिटाओ,देश को बचाओ ।
जय भारत , जय हिंद , वन्दे मातरम ।

मंगलवार, 31 मई 2011

हमारा मंच

साथियों ,

हमारा मंच की स्थापना के तीन वर्ष हो चुके हैं। हमारा मंच की प्रति सप्ताह होने वाली बैठक में तमाम जन आंदोलनों तथा सामाजिक  घटनाओ पर लगातार चर्चा की जाती है। संसथान में कार्य कर रहे कामगार साथी चांहे वे  किसी भी कार्य से जुड़े साथी । आप सभी को मालूम है की आज के समय में हमारी समस्याओं को सुनने या संसथान के सामने उठाने वाला कोई भी संगठन  नहीं है।
हमारा मंच से जुड़े साथियों ने समय समय पर कई समस्याओं को साझा कर  उनका हल भी निकाला है , तथा पुनः उन साथियों को उनका अधिकार मिला है। वैसे तो  संसथान का नाम देश विदेश एवं हर तरफ रोशन हो रहा है ,लोगों में यह धारणा बनी है कि इस संसथान में हर तरफ अच्छा एवं स्वस्थ्य माहोल है ।  हर वर्ग के लोग संसथान की उन्नति में अपना योगदान दे रहे हैं। परन्तु यदि देखा जाये तो सुख सुविधाओं के लिए संसथान में लोगों को दो भागों में बाँट दिया गया है।
१.)  फैकेल्टी व कर्मचारी जिनके लिए सुख सुविधाओं का अम्बार लगा है तथा जिन्हें एक मजदूर के एक माह में मिलने वाले  वेतन के बराबर उनका दैनिक वेतन होता है।
२.)        दूसरा वर्ग  ठेका मजदूर जिनको सरकार द्वारा निर्धारित मजदूरी भी नहीं मिलती , जबान खोलने पर नौकरी से निकाल दिया जाता है। किसी से बात न कर सकें इसलिए  परिसर में घुसने पर पाबन्दी लगा दी जाती है। उसे किसी अपराधी की तरह देखा जाता है, अपने अधिकारों की बात तो दूर मौलिक अधिकारों को भी छीना जा रहा है। जैसे - हम एक साथ  बैठ कर बात नहीं कर सकते , खाना नहीं खा सकते , हम काम के दौरान थक जाने पर बैठ नहीं सकते , शौचालय नहीं जा सकते यह सब करने पर अधिकारीयों द्वारा फोटो खिचवाया  जाता है, अगले दिन कामगार साथी को निकाल 
दिया जाता है या फिर  बैठकी   दे  दी  जाती  है संसथान के हिसाब  से  हमें  आठ या उससे अधिक घंटे कार्य करना चाहिए जो कामगार साथी का सीधे शोषण  है।  पर साथियों जब तक हमारा जीवन है कमाकर खाना हमारी जरूरत है। इसके लिए लगातार संघर्षरत रहना जरूरी है व हमें हमारे अधिकारों को जानना भी बहुत जरूरी है । जिन अधिकारों को पाने के लिए हमें कोई नहीं रोक सकता । साथियों हम अपने अधिकारों को पहिचाने इसके लिए ......

१) एक दूसरे को जानना - साथियों यदि देखा जाये तो संसथान में कामगार साथियों की संख्या ४००० हजार से ज्यादा है  जो गिनती में सबसे ज्यादा हैं पर ताकत में कमजोर होने के  कारण लगातार भयभीत किया जा रहा है । बातचीत करना दूर हम एक दूसरे को देख भी नहीं सकते क्यूंकि निकाले जाने का डर बना रहता  है। जबकि आपस में बातचीत करना हमारा कानूनन अधिकार है इसलिए भय को भगाना है व आपस में संपर्क रखना जरूरी है। इसके लिए आप संसथान के बाहर भी मिल सकते हैं।

 
२) एक दूसरे  के काम आना आपस में संपर्क - संसथान में ए दिन हादसे होते रहते हैं , पर कामगार  साथियों को पता ही नहीं चल पाता की आज हमारे साथी के साथ क्या हादसा हुआ है क्यूंकि ठेकेदार और अधिकारीयों द्वारा हमको भ्रमित रखा जाता है और हम उनकी बातों में आ जाते  हैं जबकि ऐसी घटनाओं की जानकारी होते ही एक दूसरे को तुरंत बताना चाहिए जिससे इन घटनाओं पर अंकुश लग सके तथा एक साथ मिलकर पीड़ित परिवार के  साथ खड़े हो सकें , यह पहल हमें एक दूसरे से जोड़ती है।  
३) संगठित होना -  जहाँ भी कार्य कर रहे हैं वहां अपने समूह में आपस में बातचीत के द्वारा समस्याओं को साझा करें फिर दूसरे समूहों से परिसर के बाहर या अपने गाँव में एक स्थान पर बैठकर बातचीत करें , जिस दिन ऐसा होगा हम संगठित होने में सफल होंगे।
४) संगठन की आवश्यकता - संगठन तो एक सहारा होता है असल में संगठन के पीछे साथियों की संगठित ताकत होती है जो अपनी मांगों को मनवा सकती है। संगठित होने की वजह से कई जगह कामगार साथी वापस काम पर रखे गए। पर्यावरण बिल्डिंग में कार्य करने वाले साथियों ने अपनी संगठित ताकत के बल पर ठेकेदार द्वारा काटा गया पैसा वापस लिया और इसी ताकत के बल पर लेबर कोर्ट में संसथान के ऊपर लगाये गए मुक़दमे भी लड़ रहे हैं। वी.एच व हाल-७ तथा ८ के साथियों ने संगठित ताकत के बल पर अपने काम को वापस लिया । यह पर्चा बताना चाहता है हम सभी संगठित होकर जिस दिन एक ताकत बन जायेंगे उस दिन लम्बी लड़ाई जीत सकते हैं। इसके लिए संगठित होकर एक संगठन बनाने की जरूरत है --आपके सुझाव का स्वागत है।

मजदूर हैं, मजबूर नहीं, शिक्षित होंगे , संगठित होंगे , संघर्ष करेंगे ।





























शनिवार, 22 मई 2010

Corruption

Corruption to talk about so here we'll do just India. Will improve your home before you will be able to speak out. Unless both sides will be prevented from below and above by then it is impossible to finish.